वह रिबन कहाँ मिला था, मुझे याद नहीं था

वह रिबन कहाँ मिला था, मुझे याद नहीं था। मैं जब कमरे में आया तब हवा से लहराए रिबन की ओर ध्यान गया। याददाश्त खो चुके व्यक्ति की तरह मैं अधखुला मुँह लिए खड़ा रहा। अपनी अंगुलियों में फंसे रिबन को देखता रहा।
मैं सीढियां उतरने लगा। अंतिम सीढ़ी तक आने के बाद मैंने दाएं-बाएं देखा। मैं याद करना चाह रहा था कि किस ओर से मैं घर आया था।
मैं गली को देख रहा था और याद करना चाह रहा था कि किस जगह से मैंने ये रिबन अनजाने उठा लिया। लेकिन मुझे कुछ याद न आया। मैं थकने लगा था इसलिए कमरे में लौट आया। कुछ देर रिबन को देखने के बाद खिड़की की ओर चल पड़ा।
नीचे गली में कुछ दूर बच्चे खेल रहे थे। मैंने रिबन का रंग देखा ताकि नीचे गली में खेल रही किसी लड़की ने अगर रिबन बाँधा हो तो उसके रिबन के रंग से मिला सकूँ। लेकिन गली में खेल रहे बच्चों में कोई लड़की न थी।
खिड़की से हवा आ रही थी। मैंने रिबन को खिड़की की ग्रिल के बीच बांध दिया। अब वह तेज़ हिलने लगा था।
मुझे लगा कि अब मैं इस रिबन से मुक्त हो गया हूँ।
मैं जूते उतारने लगा। नीचे फ़र्श की ओर देखते हुए भी मैंने नज़र उठाकर खिड़की को देखा। मैं कपड़े बदलते हुए भी जाने क्यों मुड़कर रिबन को देखता रहा। मैं बिस्तर पर बैठ गया। मेरी नज़र फिर उधर गई।
मैं अपने कमरे में कुछ भी कर रहा होता मेरा ध्यान रिबन पर जाता।
मेरे कमरे की घण्टी कर्कश आवाज़ करती है। करर्रर करर्रर। इसलिए जब भी घण्टी बजाने वाला बटन को आहिस्ता से थोड़ा सा दबाता है तो मैं समझ जाता हूँ कि ये टिफिन वाला है।
मैं जानता हूँ वह टिफिन रखकर चला जायेगा लेकिन फिर भी मैं बिस्तर से उठ जाता हूँ। उठते हुए भी एक बार खिड़की की ओर देखता हूँ।
कभी-कभी कोई याद रिबन की तरह मेरी अंगुलियों को छूने लगती है।
उस याद को कहीं पर टांगा भी नहीं जा सकता।
- Kishore Choudhary
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